Mridang Ek Adhyan


 मृदङ्ग : एक अध्ययन भारतवर्ष के प्राचीन ताल वाद्यों में मृदङ्ग का नाम सर्वप्रथम आता है । पौराणिक कथाओं के आधार पर तो भगवान शङ्कर ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध कर उसके रक्त से मिट्टी सानकर उसका एक पिंड बनाया और उसी राक्षस की खाल मढ़कर , ब्रह्मा जी ने उस वाद्य ( मृदङ्ग ) पर भगवान शङ्कर के तांडव नृत्य के साथ सङ्गति की । परन्तु कुछ प्राचीन पुस्तकों के आधार पर कहा जाता है कि मृदङ्ग का प्राचीन नाम पुष्कर था और इसमें तीन मुख हुआ करते थे । धीरे - धीरे चलकर इसके दो मुख रह गये और मिट्टी के बने होने के कारण इसका नाम मृदङ्ग पड़ा । हिन्दू - धर्म के अनुसार इस वाद्य के देवता नन्दिकेश्वर है । मृदङ्ग , भारत के प्राचीन काल का अत्यन्त प्रचलित वाद्य है , फिर भी इसका क्रमिक इतिहास उपलब्ध नहीं है । थोड़ी - थोड़ी चर्चा इधर उधर मिलती है , तेरहवीं शताब्दी में नारद ने अपने ग्रन्थ ' सङ्गीत - मकरन्द ' में भी मृदङ्ग को चर्चा की है । ऐसा प्रतीत होता है कि मुसलमानों के आगमन के बाद सङ्गीत के बहुत से परिवर्तनों के साथ ही मृदङ्ग का नाम भी पखावज में परिवर्तित हुआ हो । कुछ लोग मृदङ्ग और पखावज को दो भिन्न वाद्य मानते हैं , परन्तु इसको दो न मानकर केवल एक वाद्य के दो नाम ही मानना उचित है । अनुमान है कि पखावज का जन्म ईसा से कोई ५ : ४ वर्षों पूर्व हो चुका था । उपनिपदों तथा पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है । उस समय मृदङ्ग केवल मिट्टी का ही बनाया जाता था । इसलिये उसमें गट्ट नहीं लगाये जाते थे । चढ़ाने या उतारने के लिये केवल बद्धियो को ढीला या कस दिया जाता था । भारत में यवनों के आगमन के बाद मृदङ्ग का शरीर लकड़ी का बनाया जाने लगा और धीरे - धीरे करके उसको चढ़ाने या उतारने के लिये गट्ठों का प्रयोग किया जाने लगा । तेरहवीं शताब्दी तक भारत में यवन शासकों का पूर्ण रूप से अधिकार हो I 

मृदङ्ग : एक अध्ययन ] [ ८७ चुका था । यवन राज्य काल में कई सङ्गीत प्रेमी बादशाह हुये जिनसे ख्याल अङ्ग की गायकी का जन्म हुआ । मृदङ्ग की सङ्गति ध्रुपद - धमार जैसी गम्भीर और जोरदार गायकी के ही लिये उपयुक्त थी । धीरे - धीरे ख्याल गायकी का चार बढ़ने लगा और ध्रुपद - धमार की गायकी का प्रचार कम होने लगा । उसी के साथ ही साथ उसके जीवन साथी मृदङ्ग का भी प्रचार कम होता चला गया । आज तो मुश्किल से कभी ध्रुपद सुनने का अवसर मिलता है और उसके साथ भी पखावज के स्थान पर तबले से ही काम निकाल लिया जाता है । मृदङ्ग के अङ्ग तबले में दाहिना और बाँया दो अलग - अलग भाग होते हैं और उनको साथ रखने से तबले की संज्ञा दी जाती है । परन्तु उसके विपरीत पखावज का शरीर एक होता है और इसके दो मुह होते हैं । एक के मुंह का व्यास ६-७ इञ्च के लगभग होता है । तबले के समान उस पूर पूड़ी बनी हुई होती है , उसे दाहिना कहते हैं । दूसरी ओर का मुंह करीब 8-१० इञ्च का होता है और उस पर सादी पूड़ी मुबी हुई होती है , उसको बाँया कहते हैं ।

मृदङ्ग का शरीर लकड़ी का लगभग २४-२६ इञ्च का हुआ करता है . जो अन्दर ढोल के समान पूर्णतः पोला होता है । पखावज के लिये विजयसाल या कत्थे की लकड़ी अच्छी मानी जाती है । दाहिने और बायें की पूड़ी एक साथ चमड़े की पट्टी से कसी रहती है , जिसे बद्धी कहते हैं । पखावज के करीब बीच में आठ गोल - गोले लकड़ी के टुकड़े लगे रहते हैं , जिसे गट्ट कहते हैं । दाहिने और बायें के पूड़ी के अङ्गों के नाम तबले में पूड़ी के अङ्गों के नाम के ही समान – दाहिने में चाँटी , लौ , स्याही , गजरा तथा बायें में गोट , मैदान और गजरा होता है । बाय में केवल अन्तर यह होता है कि तबले के बायें में स्याही स्थायी रूप लगी हुई होती है और पखावज का बायाँ सादा रहता है और वादन के समय गुथा हुआ जौ या गेहूँ का आटा चपका दिया जाता है और वादन के पश्चात् चाय का आटा किसी चपटी वस्तु से निकाल दिया जाता है । शुदङ्ग को मिलाने की विधि तथा आँटे का उद्देश्य मृदङ्ग अधिकतर मन्द्र या मध्य सप्तक के षड़ज ( सा ) या पञ्चम ( प ) मेंमिलाया जाता है । तबले की अपेक्षा मृदङ्ग के दाहिने का मुंह बड़ा होता है , इसलिये वह बहुत ऊँचे स्वर में नहीं मिलाया जा सकता । मृदङ्ग को चढ़ाने के लिये उसके गट्टों को हथौड़ी से आघात करके बीच की ओर किया जाता है क्योंकि बीच का भाग ही अधिक मोटा होता है और उस तरफ गट्टों को करने से बद्धियों में तनाव आ जाती है । उसको उतारने के लिये गट्टों को हथौड़ी के आघात से बायें के मुह की ओर किया जाता है । स्वर में थोड़ा अन्तर रह जाने पर गजरे पर आघात करके वाद्य मिला लिया जाता है । यह हम पहले ही बता चुके हैं कि मृदङ्ग के बाएँ में स्याही नहीं होती । उसके स्थान पर गेहूँ या जौ का आटा पानी में गूथ कर चपका दिया जाता है । दाहिने और बाएँ के स्वर में सामन्जस्य स्थापित करने के लिये बाएँ को भी चढ़ाया और उतारा जाता है । उसको उतारने के लिये गुथे हुये आटे को मात्रा बढ़ा दी जाती है और चढ़ाने के लिये उसकी मात्रा कम कर दी जाती है । वादन समाप्त करने के पश्चात् उस आटे को खुरच कर निकाल लिया जाता है और पुनः वादन के लिये ताजे गुथे हुये आटे का प्रयोग किया जाता है । मृदङ्ग की बैठक मृदङ्ग वाद्य को ढोलक के समान लेटाकर बजाया जाता है , जिससे दाहिना और बायाँ मुंह सदा उल्टी दिशाओं में रहते हैं । वादक अधिकतर पल्थी लगा कर बैठते हैं और बिलकुल उसी के नीचे गुड़री के सहारे वाद्य रखा लेते हैं । दाहिने का मुह कुछ ऊँचा होता है । यह जोरदार , गम्भीर तथा वजनी वाद होता है । अतः यह पुरुषों के ही बजाने योग्य है । मृदङ्ग के वर्ण मृदङ्ग पर निकलने वाल अक्षरों को पाट या तबले के समान वर्ण कहते हैं । इसकी संख्या के विषय में एक मत नहीं है । कुछ लोगों ने १६ , कुछ लोगों ने १० , कुछ लोगों ने केवल चारही वर्ग माने हैं । वर्गों की संख्या ७ मानने वालों की संख्या अधिक है , क्योंकि १६ और १० वर्गों में कुछ मिश्र वर्ण भी आते हैं , जो शुद्ध वर्णों के संयोग से बनाये जाते हैं । ता , दी , थु , न ये चार वर्ण बहुत प्राचीन काल में माने जाते थे । मृदङ्ग के ७ वर्ण इस प्रकार हैं केवल दाहिने पर निकलने वाले वर्ण ता , दी , न , ते और टे । बाएँ पर निकलने वाले वर्ण क और घ या ग । इसके अतिरिक्त मृषङ्ग - वादन में प्रयोग किये जाने वाले बोल अधिकतर इन्हीं बोलों के मिश्रण से बनते हैं । जैसे दाहिने पर ता और बाये पर ध , दोनों एक साथ बजाने से धा निकलता है । प्रत्येक वर्ण को निकालने के लिये एक निश्चित स्थान और हाथ की एक निश्चित् स्थिति होती है । परन्तु व्यावहारिक रूप में हम देखते हैं कि कभी कभी बोल के पढ़न्त और निकास में बहुत अन्तर रहता है । आवश्यकता इस बात की है कि मृदङ्ग के वर्णी को निकालने का स्थान वैज्ञानिक ढङ्ग पर निश्चित कर लिया जाये जो सर्वमान्य हो , तभी कौन - सा मृदङ्ग के किस स्थान पर निकलता है , इस बात का अन्तिम निर्णय हो सकेगा । परन्तु क्रियात्मक अध्ययन से ज्ञात होता है कि यह कार्य असम्भव नहीं , तो बहुत कठिन अवश्य है । क्योंकि एक ही वर्ण भिन्न भिन्न स्थानों पर अपना भिन्न भिन्न अस्तित्व रखते हैं । इसीलिये उसका निकास भी भिन्न - भिन्न रीति से होता है । ऐसा ज्ञात होता है कि जिस प्रकार भाषा में पर्यायवाची शब्द होते हैं , उसी प्रकार ही बोल निकालने के लिये भिन्न - भिन्न वर्ण प्रयोग किये जाते हैं ।

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