Musical history of India


 भारतीय सङ्गीत का इतिहास सङ्गीत को उत्पत्ति के विषय में कुछ भी निश्चित् रूप से कहा नहीं जा सकता । इसकी उत्पत्ति का समय तो मानव - सभ्यता के विकास का प्रारम्भिक समय माना जा सकता है और यह कैसे हुई , यह भी कहना कठिन है ।इस विषय पर भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों ने अपने अलग - अलग विचार दिये हैं , जो एक दूसरे से भिन्न हैं । अतः किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है । विशेष रूप से हिन्दुओं ने सङ्गीत की उत्पत्ति का सम्बन्ध देवी - देवताओं से जोड़ रक्खा है । कुछ विद्वानों का कथन है कि सङ्गीत की उत्पत्ति वेदों के निर्माता ब्रह्मा जी ने की । ब्रह्मा जी ने यह कला शिव जी को , शिव जी ने देवी सरस्वती को और सरस्वती जी

ने नारद को प्रदान किया ।

 

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 नारद जी स्वर्ग के गन्धर्व , किन्नर एवं अप्सराओं को यह शिक्षा दी । फिर भरत , नारद और हनुमान आदि ऋषि इस कला में पारंगत होकर भूलोक पर आये और इसका प्रचार किया । एक ग्रन्थकार के अनुसार नारद जी ने अनेक वर्षों तक योग - साधना की , तब शङ्कर जो प्रसन्न होकर उनको सङ्गीत का वरदान दिया ।                                                                               

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शिव जी ने पार्वती की शयन - मुद्रा को देखकर , उनके अङ्ग प्रत्यांगों के आधार पर रुद्र वीणा तथा पाँच रागों को जन्म दिया और पार्वती जी ने छठे राग को । ' सङ्गीत दर्पण ' के लेखक श्री दामोदर पन्डित के अनुसार भी सङ्गीत का 

                                             

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 उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि मानव ने विभिन्न पक्षियों के स्वरों के द्वारा स्वरों का ज्ञान प्राप्त किया । पाश्चात्य विद्वान फ्रायड का मत है कि सङ्गीत की उत्पत्ति एक शिशु के समान मनोविज्ञान के आधार पर हुई ।                                                        

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जिस प्रकार एक बालक रोना , चिल्लाना हँसना आदि क्रियाये मनोविज्ञान की आवश्यकतानुसार स्वयं सोख जाता है , उसी प्रकार सङ्गीत का प्रादुर्भाव मानव में मनोविज्ञान के आधार पर स्वयं हुआ है । 

जेम्स लांग और उनके मतानुयायियों का कथन है कि पहले मनुष्य ने बोलना - चालना सीखा तत्पश्चात् पुनः क्रियाशील हो जाने पर उसके अन्दर सङ्गीत स्वयं उत्पन्न हुई । इसी प्रकार सङ्गीत के जन्म के विषय में बहुत से विचार पाये जाते हैं । परन्तु उनमें से सहसा किसी एक पर विश्वास नहीं होता , क्योंकि कोई भी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता , फिर भी उपलब्ध इतिहास के आधार पर सङ्गीत के इतिहास को निम्नलिखित चार कालों में विभाजित किया जा सकता है । ( १ ) आदिकाल - ईसा से १००० वर्ष पूर्व तक । ( २ ) प्राचीनकाल – ईसा से १००० वर्ष पूर्व से ८०० वर्ष ईसा बाद तक । ( ३ ) मध्यकाल -८००० से १८०० ईसा तक । ( ४ ) आधुनिककाल -१८०० ईसा से आज तक ।

 

आदिकाल - सङ्गीत में आदिकाल वैदिक कालके नाम से जाना जाता है । इसका समय ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व तक माना गया है । इस काल में वेदों की रचना हुई , जिसमें मानव धर्म के आध्यात्मिक और भौतिक स्वरूप का वर्णन किया गया और मानव - जीवन को सर्वोत्कृष्ट बनाने के लिये सत्यं , शिवं और सुन्दरम् का अनुसन्धान किया गया । चार वेदों में से सामवेद में केवल सङ्गीत के तत्वों का निरूपण किया गया है । 

 इसमें केवल तीन स्वरों का उल्लेख किया गया है , जिनके नाम हैं - उदात्त , अनुदात्त और स्वरित । ये तीन स्वर सामवेद के अनुसार अभिमान्य हैं जो आधुनिक काल में ग , रे और स के नाम से जाने जाते हैं , किन्तु सामवेद में इन तीन स्वरों का वर्णन दूसरे रूप में पाया जाता है । सामवेद के पाश्चात् ' नारदीय शिक्षा ' और ' वृहद्दशी ' नामक ग्रन्थ विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इनमें स्वरों के विकास का क्रम वर्णित है । इससे ज्ञात होता है कि इन ग्रन्थों के निर्माण काल में सामवेद में वरिणत तीन स्वर , सात स्वरों में परिणित हो गये थे । ऋग्वेद में चार स्वरों का वर्णन मिलता है । सामवेद के पश्चात जितने भी ग्रन्थ लिखे गये , उन सभी में सामवेद को ही आधार मानकर सात स्वरों की कल्पना की गई । इससे प्रमाणित होता है कि सामवेद के समय में ही सातों स्वरों का विकास हो चुका था । सामवेद में ग्रामों का उल्लेख किया गया है तथा इसमें वाद्यों के प्रकारों का भी वर्णन मिलता है । वाद्यों में दुन्दुभि , वानस्पति तथा वीणा आदि मुख्य हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि वैदिक काल में गायन - वादन का काफी विकास हो चुका था । प्राचीनकाल प्राचीन काल में ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व से करीब ईसा के ८०० वर्ष बाद तक का समय आता है । ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व से एक ईसवी तक का समय संदिग्ध काल कहा जा सकता है । क्योंकि उस समय का कोई भी ऐसा प्रमाणित ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है , जिसमें कि उस समय के सङ्गीत की स्थिति का कुछ ज्ञान हो सके । केवल उस समय के कुछ उप निषद् मिलते हैं , जिनमें सङ्गीत को थोड़ी चर्चा की गई । रामायण में विभिन्न प्रकार के वाद्यों तथा उपमाओं का उल्लेख मिलता है , जिनमें ज्ञात हुआ है कि सङ्गीत का प्रचार जनता में बराबर चलता रहा । प्राचीन काल का विशेष उल्लेख हम ' महाभारत ' से प्राप्त कर सकते हैं । महाभारत में अनेक वाद्यों का उल्लेख मिलता है , जिनमें मृदङ्ग , डिमडिम और वीणा मुख्य है । स्वरों के सम्बन्ध में षड़ज , मध्यम और गाँधार तथा ग्रामों का भी उल्लेख मिलता है । सामगान के तीन स्वर प्राचीन काल में आकर विकसित हये । इस काल को पौराणिक युग माना जाता है । पुराणों में सर्वत्र गायन , वादन और नृत्य की चर्चा मिलती है । उस समय के जो ग्रन्थ आज उपलब्ध है , उनकी चर्चा हम संक्षेप में करेंगे जिससे उस समय के सङ्गीत की वर्तमान स्थिति और विकास का ज्ञान हो सके । इस श्रेणी में प्रथम ग्रन्थ भरत का ' नाट्यशास्त्र ' आता है । उसकी रचना का समय अधिकतर विद्वान पाँचवीं शताब्दी मानते हैं । यह ग्रन्थ मुख्यतः नाट्य से सम्बन्धित है , किन्तु इसके छः अध्यायों में संगीत की चर्चा की गई है । इससे ज्ञात होता है कि उस समय तक सङ्गीत और नाट्य का सम्बन्ध घनिष्ट हो चुका था । उस ग्रन्थ के कुछ उल्लेखनीय तत्व इस प्रकार हैं । भरत ने केवल मध्यम और षड़ज ग्राम का वर्णन किया है । गंधार ग्राम को पूर्णतः छोड़ दिया । षड़ज ग्राम की सात और मध्यम ग्राम की ग्यारह , इस प्रकार कुल अठारह जातियाँ मानी गयीं । जाति के दस लक्षण माने गए हैं । वादी , सम्वादी , अनुवादी और विवादी का वर्णन किया गया है । स , म , प की चार - चार , ग व नि की दो - दो और रे तथा ध की तीन - तीन श्रुतियाँ मानी गई हैं । भरत के बाद दात्तिल का बनाया हुआ ' दत्तिलम् ' ग्रंथ मिलता है । इस अथ की रचना काल भी पांचवीं शताब्दी के लगभग मानी जाती है । इसमें गाँधार ग्राम का भी उल्लेख करके षड़ज , मध्यम और गाधार ग्रामों का उल्लेख किया है । इसके अतिरिक्त विवादी स्वरों का अन्तर केवल दो ही श्रुतियों का माना गया है । दात्तिल ने भरत की अठारह जातियों को ही स्वीकार किया है । दात्तिल के बाद मतङ्ग मुनि ने लगभग छठवीं शताब्दि में ' वृहद्देशी ' नामक अथ की रचना की । इस ग्रन्थ में जाति गायन के स्थान पर राग गायन का उल्लेख मिलता है , जो सम्भवतः सङ्गीत के इतिहास सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ में मिलता है । इसमें ग्राम और मूर्छना का विस्तृत वर्णन मिलता है तथा गाँधार ग्राम का भी वर्णन किया गया है । वृहद्द शी में सामवेद के तीन स्वरों का भी वर्णन किया गया है । भरत के समान मतङ्ग मुनि ने भी वादी , सम्वादी में कम से कम नौ और अधिक - से - अधिक तेरह श्रुतियों तथा विवादो में बीस श्रुतियों का अन्तर माना है । वृहद्दशी के पश्चात् नारद का समय आया , जिन्होंने लगभग आठवीं शताब्दी में ' नारदीय शिक्षा ' नामक ग्रन्थ की रचना की । इसमें सात ग्राम रागों का उल्लेख किया गया है , जिनके नाम इस प्रकार हैं- ( १ ) षाडव ( २ ) पंचम ( ३ ) मध्यम ( ४ ) षडज ग्राम ( ५ ) साधारिता ( ६ ) कौशिक मध्यम ( ७ ) मध्यम - ग्राम । इस ग्रन्थ में पुरुष राग , स्त्री राग तथा नपुसक राग को चर्चा की गई है । भरत के बनाये हुए तैतीस अलङ्कारों के स्थान पर इसमेंकेवल उन्नीस अलङ्कारों तथा नाद के पांच भेदों का निरूपण मिलता है । प्राचीन युग के ये कुछ उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं । इनके अतिरिक्त प्राचीन शिलालेखों तथा प्राचीन भग्नावशेषों से भी उस समय के सङ्गीत का अनुमान लगाया जा सकता है । मध्यकाल -- इस काल का समय ८ वीं शताब्दी से १८ वीं शताब्दी तक का माना जाता है । सुविधा के लिए इसको दो विभागों वे विभाजित किया जा सकता है - पूर्व मध्यकाल ( ८ वीं से १३ वी शताब्दी तक ) तथा उत्तर मध्य काल ( १३ वीं से १८ वीं शताब्दी तक ) । पूर्व मध्यकाल - भारतीय सङ्गीत के इतिहास में पूर्व मध्य काल ८ वीं से १ ३ वी शताब्दी तक माना जाता है । प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस प्रकार आजकल राग गायन का प्रचार है , उसी प्रकार उस समय प्रबन्ध गायन का प्रचार था । इसलिए इस काल को प्रबन्ध काल भी कहा जा सकता है । इस समय सङ्गीत को अच्छी प्रगति हुई । छोटी बड़ी रियासतों में सङ्गीत का संरक्षण और संगीतज्ञों को आश्रय मिलने से सङ्गीत को खूब प्रगति हुई । परन्तु १००० ई ० से भारत के उत्तरी भाग पर मुस्लिम आक्रमण , प्रारम्भ हो गए । इन आक्रमणों से भारत अपनी रक्षा न कर सका । इसका प्रभाव यहाँ के निवासियों पर पड़ा और यहाँ आध्यात्मिक विकास शनैः शनैः समाप्त होने लग गया । लगभग १३ वीं शताब्दी तक मुस्लिम विजेताओं ने भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया । धीरे - धीरे उनकी सभ्यता , संस्कृति और संगीत का प्रभाव यहाँ पर पड़ने लगा । इसका विशेष प्रभाव उत्तर भारत पर पड़ा और दक्षिण का भाग लगभग अछूता रह गया । जिसके फलस्वरूप उत्तर भारत में एक ऐसी सङ्गीत - पद्धति का जन्म हुआ , जो अपनी प्राचीन सङ्गीत - पद्धति से भिन्न प्रतीत होने लगी । यह सङ्गीत का नवीन रूप धीरे - धीरे विकसित होकर प्राचीनता से इतना दूर हो गया कि भारत में दो सङ्गीत पद्धतियाँ हो गई । एक कर्नाटकी सङ्गीत - पद्धति और दूसरी हिन्दुस्तानी सङ्गीत पद्धति या उत्तर भारतीय सङ्गीत पद्धति । सङ्गीत का सर्वाधिक विकास अकबर के समय में हुआ । इस काल की जो मुख्य पुस्तकें उपलब्ध हैं , वे निम्न हैं नारद कृति सङ्गीत मकरंद ' - इसका समय १३ वीं शताब्दी माना जाता है । इस गून्य में राग - रागिनी का निरूपण किया गया है । जयदेव कृत ' गीत गोविन्द ' -- जयदेव कवि होने के साथ - साथ गायक भी थे । इस पुस्तक में प्रबन्धों और गीतों का संग्रह है , जो स्वर लिपिबद्ध नहीं है । शारङ्गदेव कृत ' सङ्गीत रत्नाकर ' - इस काल की सब से महत्वपूर्ण रचना संस्कृत भाषा में १३ वीं शताब्दी में की गई । इस पुस्तक को उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों अपना आधार ग्रन्थ मानते हैं । शारङ्गदेव ने सम्वादी स्वर का अन्तर आठ अथवा बारह श्रुतियों का माना है । जबकि इसके पूर्व भरत , दात्तिल तथा मतंग ने नौ अथवा तेरह श्रुतियों का अन्तर माना है । इसमें गाँधार ग्राम का विस्तृत वर्णन मिलता है तथा ताल - वर्णन का भी एक अध्याय है । अब आवश्यकता यह है कि इस पुस्तक के बहुत से अस्पष्ट अध्यायों के विषय में खोजपूर्ण कार्य किया जायें । उत्तर मध्यकाल -- इस काल का प्रारम्भ १३ वीं शताब्दी से हो कर अठारहवीं शताब्दी तक चलता है । इस समय तक उत्तर भारत में मुसलमानों ने अपना राज्य स्थापित कर लिया था । अधिकतर मुसलमान शासक सङ्गीत प्रेमी थे । अतः उन्होंने अपने दरबार में सङ्गीतज्ञोंका आदर किया और कलाको प्रोत्साहन दिया । इस युग को सङ्गीत के विकास का युग भी कहा जा सकता है । इस युग में सङ्गीत में महान् अन्तर आया । नई गायकी का प्रादुर्भाव हुआ , नए - नए राग - रागिनी , वाद्यों एवं तालों का आविष्कार हुआ — जिनका हम आगे अध्ययन करेंगे । सङ्गीत के इतिहास की दृष्टि से सन् १२६६ से सन १३१६ तक का बाद शाह अलाउद्दीन खिजली का समय अति महत्वपूर्ण है । इनके दरबार में अमीर खुसरू नामक एक प्रसिद्ध विद्वान हुआ । कहा जाता है कि आज के प्रचलित वाद्य तबला और सितार के आविष्कारक वही थे । उन्होंने साजगिरी , सरपर्दा , जिलफ राग , झूलरा , आड़ा - चारताल तथा फरोदस्त ताल तथा छोटा ख्याल और तराने का आविष्कार किया । उस समय के प्रसिद्ध सङ्गीतज्ञों में कल्लिनाथ का नाम उल्लेखनीय है , जिन्होंने राग - रागनी वर्गीकरण में महत्वपूर्ण योग दिया । तत्पश्चात् सङ्गीत का स्वर्ण युग सन् १५५६ में १६०५ , ई ० तक का आता है , जो अकबर का शासन काल था । अकबर स्वयं महान् सङ्गीत प्रेमी था । उसके समय में सङ्गीत का अच्छा प्रचार हुआ । ' आइने अकबरी ' के अनुसार नायक बैजू , तानत रंग , गोपाल तथा सबसे मुख्य सङ्गीत सम्राट तानसेन उस समय थे । तानसेन की देन सङ्गीत को बहुत कुछ है । उन्होंने बहुत से रागों की रचना की । जिन में दरबारी कान्हड़ा , मियाँ की सारंग , मियाँ की मल्हार आदि मुख्य हैं । तानसेन के पश्चात् उनकी वंश एवं शिष्य परम्परा सैनी घराने के नाम से विख्यात हुई । तानसेन ने बहुत से ध्रुपद बनाये और कहा जाता है कि उनको कई राग सिद्ध भी थे । अकबर के हो समय में राजामानसिंह तोमर हुए , जिन्होंने खालियर घराने को जन्म दिया । अकबर के राज्यकाल में ही महान् कवि तुलसीदास , सूरदास , मीराबाई आदि हुए हैं , जिन्होंने भजनों के द्वारा सङ्गीत का प्रचार किया । दक्षिण में पुंडरीक बिट्ठल नामक विद्वान हुए , जिन्होंने कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की । अकबर के पश्चात् जहाँगीर और शाहजहाँ का समय आता है , जिनका शासनकाल क्रमशः १६०५ से १६२७ तक , तथा १६२७ से १६८५ तक था । ये दोनों बादशाह सङ्गीत के प्रेमी थे । वे सङ्गीतज्ञों का आदर करते थे और बिलास खाँ , छतर खाँ , ताल खाँ आदि प्रसिद्ध सङ्गीतज्ञों को आश्रय दे रक्खा था । १६५० में पं .० अहोबल कृति , ' सङ्गीत पारिजात ' नामक पुस्तक की रचना हुई । इस ग्रन्थ में प्रथम बार वीणा के तार पर बाहर स्वरों की स्थापना का प्रयत्न किया गया । अहोबल के पश्चात् पं ० श्री निवास का समय आता है । इनका समय लगभग १८ वीं शताब्दी माना जाता है । श्री निवास ने ' राग तत्व ' विबोध ' नामक ग्रन्थ लिखा , जिसमें वीणा के तार की लम्बाई के आधार पर बारहों स्वरों की स्थापना की गई । मसलमानों के राज्य काल में सबसे अधिक सङ्गीत का विरोधी बादशाह औरंगजेब हुआ , जिसका शासन - काल सन् १६८५ से १७०७ ई ० तक था । उसने सङ्गीतज्ञों को सङ्गीत त्यागने के लिए बाध्य कर दिया । वाद्यों को जलवा दिया और सङ्गीत का जनाज़ा निकलवाया और उसको दफनवा दिया । इस काल में सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ ' चतुर्दण्डप्रकाशिका ' सन् १६६० ई ० में दक्षिण के सङ्गीतज्ञ व्यंकटमुखी ने लिखा । उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक सप्तक में अधिक से अधिक ७२ थाटों को रचना हो सकती है तथा एक थाट से कुल ४८४ राग उत्पन्न हो सकते हैं । औरङ्गजेव के बाद सङ्गीत का फिर अच्छा समय आया जब कि मुहम्मद शाह रंगीले का शासन काल १७१६ से १७४८ ई ० तक था । वह स्वयं संगीत का बड़ा प्रेमी था । उसके दरबार में सदारङ्ग , अदारङ्ग नामक दो प्रसिद्ध सङ्गीतज्ञ थे , जिनके ख्याल आज भी खूब सुनने में आते हैं । १८ वीं शताब्दी क उत्तराद्ध में मुसलमानों का राज्य धीरे - धीरे कम होने लगा और अंग्रेजों की धाक बढ़ने लगी । इस समय केवल रियासतों में संगी । को संरक्षण मिला । उसी समय से भारतीय सङ्गीत के इतिहास का नया अध्याय , आधुनिक काल प्रारम्भ होता है । आधुनिक काल - इसका समय १८ वीं शताब्दी से आज तक का माना जाता है । अध्ययन में सुविधा की दृष्टि से १८०० से १६०० तक तथा १६०० से आज तक का समय दो भागों में बाँटा जा सकता है १ ९वीं शताब्दी के प्रारम्भ से फ्रांसीसी तथा अंग्रेज भारतवर्ष पर अधि कार प्राप्त करने के प्रयत्न में लग गये । अंग्रेजों ने धीरे - धीरे करके देश पर पूर्ण  अधिकार प्राप्त कर लिया तथा यहाँ के शासक बन बैठे । उन्होंने अपने गुलाम देश के साहित्यिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए कुछ भी नहीं किया । अतः मुसलमानी युग में जो सङ्गीत रूपी वृक्ष पल्लवित और पुष्पित हो चला था , पुनः मुरझाने लगा । सङ्गीतकला केवल चन्द रियासतों में ही सीमित हो गई । सभ्य और अच्छे परिवार से सङ्गीत का लोप होने लगा और केन्द्रित हुआ वेश्याओं के यहाँ , अतः समाज में उसके प्रति घृणा होने लगी । इस समय चन्द पुस्तकों की रचना हुई , जिसमें निम्नलिखित मुख्य हैं नग़माते आसफी ' लेखक पटना के मुहम्मद रजा -- आपने अपना एक नवीन मत छः राग छत्तीस रागिनियों का बनाया । ' सङ्गीत सार ' - लेखक जयपुर के राजा प्रताप सिंह देव । ' सङ्गीत राग कल्पद्र म ' लेखक कृष्णानन्द व्यास , इसमें बिना स्वर लिपि बद्ध किये उस समय के प्रचलित ध्रुपद आदि का संग्रह हैं । ' युनिवर्सल हिस्ट्री आफ म्यूजिक ' - लेखक बंगाल के सर सौरेन्द्र मोहन डंगोर । इसके बाद १६०० ई ० के बाद से आज तक का समय आता है । सङ्गीत ने फिर पल्टा खाया और इस डूबती हुई नौका को बचाने के लिए ही पं . विष्णु दिगम्बर पलुस्कर तथा पं . विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म हुआ । आज उच्च समाज में सङ्गीत का जो कुछ प्रचार देखने को मिलता है , उसका बहुत कुछ श्रेय इन दोनों विभूतियों को है । विष्णु दिगम्बर पलुस्कर न देश के बड़े - बड़े नगरों में भ्रमण करके सङ्गीत का प्रचार किया और लोगों को बतलाया कि सङ्गीत समाज को उन्नति की ओर ले जाने का साधन है । इसके अति रिक्त उन्होंने पंडित ओंकार नाथ ठाकुर , पं . नारायण राव व्यास , पं ० विनायक राव पटवर्धन , श्री बी ० आर ० देवधर तथा पं ० वी ० ए ० कशालकर आदि उच्चकोटि के शिष्य तैयार किये , जिन्होंने सङ्गीत का प्रचार और प्रसार किया । इसी समय आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्र स्थापित हुये तथा सिनेमा ने सङ्गीत के प्रचार में योग दिया । सन् १ ९ ४७ ई ० में भारत के इति हास का नवीन पृष्ठ खुला , जब कि देश १५ अगस्त को विदेशी शासकों से मुक्त होकर स्वतन्त्र हुआ । इसके बाद हमारी सरकार ने प्राचीन भारतीय सङ्गीत को प्रोत्साहित करने में सराहनीय योग दिया और आज भी देती आ रही है । प्रत्येक वर्ष आकाशवाणी की ओर से सङ्गीत प्रतियोगिता का आयोजन करके तथा कुशाग्र बुद्धि वाले नवयुवक विद्यार्थियों को रु ० २५००० मासिक छात्र वृत्ति देकर आने वाली सङ्गीतज्ञों की पीढ़ी को बहुत कुछ प्रोत्साहित कर रही है । राष्ट्र की ओर से प्रत्येक वर्ष देश के वयोवृद्ध तथा प्रसिद्ध सङ्गीतज्ञों का आदर सत्कार करके मान - पत्र देना बहुत महत्व रखता है । राष्ट्र के संरक्षण में अनेक सङ्गीत को संस्थायें आज सङ्गीत के प्रचार यज्ञ में महत्वपूर्ण योग दे रही है । उनमें से इलाहाबाद की प्रयाग सङ्गीत समिति , लखनऊ को भातखंडे सङ्गीत विद्यालय , ग्वालियर को माधन सङ्गीत विद्यालय तथा बम्बई को गांधर्व मा विद्यालय मंडल आदि मुख्य हैं । इसी बीच में सङ्गीत को कई पत्रिकायें निकलो और कुछ बन्द भी हुई । हाथरस से प्रकाशित ' सङ्गोत ' तथा बम्बई से प्रकाशित ' सङ्गीत कला बिहार ' की गणना अच्छी पत्रिकाओं में है । इस काल म शास्त्रीय गायन के साथ - साथ आधुनिक सङ्गीत , फिल्म सङ्गीत तथा लोक सङ्गीत का भी खूब प्रचार हुआ । शास्त्रीय सङ्गीतज्ञों में जहां पं ० ओंकार नाथ ठाकुर , बड़े गुलाम अली खाँ , उस्ताद अमीर खाँ , श्रीमती केसर बाई केरकर तथा श्रीमती गिरजा देवी का नाम लिया जाता है , वहां फिल्मी जगत के गायक श्री मुहम्मद रफी , मन्ना डे , लतामंगेशकर तथा आशा भोंसले का नाम भी गर्व बड़स लिया जाता है । भारतीय सङ्गीत की धाक विदेशों में जमाने मैं सितार वादक सर्व श्री पं ० रविशंकर , विलायत खां , सरोद वादक उ ० अली अकबर खाँ , तबला वादक श्री शामता प्रसाद तथा अल्ला रक्खा खाँ का विशेष हाथ रहा है । इनके अतिरिक्त आज देश में और भी माने हुए सङ्गीतज्ञ हैं , जिनमें सर्व श्री भीमसेन जोशी , निखिल बनर्जी , अहमद जान थिरकवा , अब्दुल हलीम जाफर , लाल जी श्रीवास्तव , रामनारायण , बिसमिल्ला खाँ , रोशन कुमारी तथा श्री गोपाल मिश्र और इसी प्रकार से बहुत से कलाकार हैं । देश के बड़े - बड़े नगरों में प्रत्येक वर्ष एक उत्कृष्ट सङ्गात सम्मेल का आयोजन करना आवश्यक सा हो गया है । 

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