लयकारी -
भारतीय सङ्गीत के दो आधार तत्व हैं - एक स्वर और दूसरा लय । जिस प्रकार गायन में स्वर का महत्व है , उसी प्रकार तबले या ताल सम्बन्धी बाघों में लय का सङ्गीत के अतिरिक्त भी लय का महत्व है । समस्त प्राणी . के हृदय की गति तथा नाड़ी एक निश्चित् लय में ही चलती है । सङ्गीत में गायक , वाहक या नर्तक एक आधार भूत लय निश्चित् कर लेता है और उसी के सहारे अपनी कलात्मक साधना विभिन्न प्रकार के लय के दर्जे करके विभिन्न लयकारियों की सृष्टि करता है । लयकारी के नामकरण का आधार है कि एक मात्र में कितनी मात्रायें की जाती हैं --- जैसे एक मात्रा में दो मात्रा कहना दुगुन की लयकारी और एक मात्रा में तीन मात्रा कहना तिगुन की लयकारी कहलाती है । ताल - परिचय भाग एक में समान लयकारी के प्रकार , विलम्बित लय , मध्यलय और द्रुतलय की चर्चा की गई है । यहाँ हम लयकारी के और दूसरे प्रकारों का वर्णन करेंगे । ठाह- ( एक मात्रा में एक संख्या बोलना ) ठाहं की लयकारी को बराबर की लयकारी भी कह सकते हैं । गायक या वादक सर्वप्रथम एक लय निश्वित् कर लेता है । उसी लय में जब एक मात्रा में केवल एक मात्रा गाया या बजाया जाता है तो उसे बराबर या ठाह की लयकारी कहते हैं । परन्तु किसी विशेष बन्दिशा , गाने की स्थाई , अन्तरे तथा गतों में यदि एक मात्र में एक से अधिक स्वर या बील आते हैं तो उसे उसी प्रकार गाना या बजाना ठाह लय के अन्तर्गत आता है । इस लय के उपाहरग में चार मात्र में १ , २ , ३ , ४ मात्रा या स्वर बोलना कहा जा सकता है । अधशुन -- ( दो मात्राओं में एक मात्रा बोलना ) एक मात्र में आधा मात्र था दो मात्राओं में एक मात्रा बोलना अधगुन कहलाता है । दूसरे शब्दों में ' कहा जा सकता है कि जितने समय में हम किसी बोल या स्वर को कहते हैं . यदि उसके दूने समय में उतने ही बोल का स्वर कहें तो अधगुन की लयकार लियकारी
लयकारी ] कही जायेगी । जैसे दो मात्र के अङ्क १ , २ को अवग्रह लगाकर १२ चार मात्राओं में लिख दें । दुगुन- ( एक मात्रा में दो मात्रा कहना ) एक मात्रा में दो मात्रा या वर बोलना दुगुन कहलाता है । जैसे चार मात्राओं के अङ्क १ , २ , ३ , ४ के दो - दो मात्राओं को एक - एक कोष्टक में रखकर दो मात्राओं में कर लें जैसे १२३ ४ तिगुन- ( एक मात्रा में तीन मात्रा कहना ) जिस प्रकार एक मात्र में दो मात्रे कहना दुगुन कहलाती है , उसी प्रकार एक मात्र में तीन मात्रा कहना ' तिगुन की लयकारी कहलाती है । जैसे छः मात्राओं के तीत - तीन मात्राओं को एक - एक भात्रा में रखकर दिखलायेंगे १ २३ चौगुन– ( एक मात्रा में चार मात्रा कहना ) एक मात्रे में चार मात्रा बोलना या कहना चौगुन की लयकारी कहलाती है । उदाहरणार्थ चार मात्र के १,२,३ , ४ को १ २ ३ ४ करके एक मात्रा में लिख देंगे । । इसी प्रकार से पञ्चगुन , छः गुन आदि सभी लयकारियों की परिभाषा लिखी जा सकती है । अब हम आगे आड़ की लयकारियों के विषय में अध्ययन करेंगे । भाड़ - इस लयकारी के अन्तर्गत बहुत प्रकार की लयकारियाँ आ सकती । परन्तु हम यहाँ हम आड़ के केवल मुख्य - मुख्य प्रकारों का ही अध्ययन से विद्वानों के अनुसार सीधी लयकारी के अतिरिक्त किसी भी प्रकार यका को जिसके अन्तर्गत एक मात्रे में डेढ़ मात्रा , तीन मात्रा या सवा . आणि सकते हैं , आड़ की लयकारी है । परन्तु यह आड़ का साधारण व्यापअर्थ है । विशेष अर्थों में एक मात्रे में डेढ़ मात्रा या दो मात्रे में मात्रा करना आड़ कहलाता है । आड़ के विशेष अर्थ वाली लयकारी को नीचे अङ्घद्वारा इस प्रकार लिखेंगे --








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